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सलाम किया । |
वेगस- आज का इकरार है न ?
दारोगा-हाँ हुजू र, खुदा मुझे सुर्जह करे। भकारदसी का नाम
सुनक्वर तो वद्द बेखुद ऐो गए। क्‍या शर्ज कहो हुनर !
बैगम-अ्रभी जाइए कौर चारों तरफ़ तलाश फीजिए।
दारोगा--हुजूर, ज़रा सबेरा तो हो ले, दो-चार झादमियों से मिहेँ,
एछ-बूछँ तथ तो मतलब निकले । यों वटश्करलैस किस सुहस्ले में माऊँ
और किससे पूछ ? ;
भव्बासी--हुज़ूर, सुके हुस्‍्म हो तो में भी दराश करें। सगर
भारी-सा जोड़ा छूँगी।
बेगम--जोड़ा | अष्छाह जानता है सिर से पाँव तक जेवर से छदी होगी।
'बीअब्बासी घन ठवकर चलीं ओर उधर दारोग़ाजी मियाने पर रूद-
कर रवाना हुए । भ्रव्यासी तो खुश-खुश जाती थी झोर यई सुंद्ट बनाएं
सोच रहे थे कि जाऊँ तो कहाँ जाऊँ ? * भ्रव्वयापी छहेँगा फड़ेकाती हुई
चली जांती थी कि राह में एक मदाबमाहब की एक सहरी मिली। दोनों
में घुल-घुलकर बातें होने लगीं ।* " 7
भव्यासी-कहो घन, खुश तो हों।। ५ ७ »४ कह,
) ई
शैधसइुलाया प्ह पे
बस्त-हाँ यह, भराष्पह शा फापछ है श्ए शा
ऋष्यासीनलुए मदर हइत, पा हाहए का पणा सशती:
फिस्मी हैँ।
पद >कीम ऐड सी सधर्ते :
हप्यासी-नयद सो मी शानतो +गाह दे मियां आणाद। खासे
धवम पंयान £।
धन्तु आर में एएय तानती । इस्री शदर के राणनेयाएँ हैं।
मगर हैं बडे मटगट, सामने ही तो रहने है। छई्ठी रोकी को गध्ीं हो ?
हैं ज्षो जदाम ऐसा ही ।
ऋअब्यामी--ऐ, इसे भो ! घट दिबट्गी इसे मी सापी ।
परत “जी, यह मफान था गया (इस, हैसी में रहते कई | गोद ने
जाता, अज्वाए-मिर्मा से गासार ।
पन्नू सो झपनो राह गई, सम्याती पृद्ठ मही हैं दोफर युक्त सटिया
के मझान पर पहुँची । झुड्धिया में एह्रा+बयव किए सरेझार में हो सी *
कंप्रामी--सुरैयाैगम के या ।
बुदिया-झीर इससे मिर्धा का क्या सास £ ?
अच्चासी«ज्जों छजपीम करो ।
बुट़ियानलों प्यारी है या येता हैं कीर्द जानन्यइईचान शुदाफागी ऐ
याकोईनहीएी
कप्ताली--प शुद्दी-पी मौत कभी फ्ी ऋापा फ्री हैं । घीर थो
इमने फिसी को झाने-आते नहों देखा । ४
बुउिवा-+कोई देपजझाए सी शाता-जासा | ?
ग्रदयासी--स्या मजाछ ! बिड्चिया तक शो पर नहीं मार पझती ?
इतने दिनों में सिर्फ कक तमाशा ठेसने गई थीं
णज६२ आज़ाद-कधा
बुढ़िया--ऐ छो, भोर सुनो | तमाशा देखने जाती हैं शोर फिर
कहती ऐो कि ऐसी-वैती नहीं हैं । शच्छा, एस टोह छा लेंगी ।
झअव्पासी--उन्हें।ने तो कप्तम खाई है कि शादी ही न फर्रुगी,' और
प्पगर करूंगी भी तो एक खूबस्रत जवान के साथ जो धापका पडोंसी
है। पियाँ चाजादं नाम है । बम
बुढ़िया--भरे, यह छितनी बड़ी बात है ! यो मैं; वहाँ ,धहुद कस
श्राती-जाती हूँ पर वह झुमे खूब जानते है। विलकुछ घर का-सा वास्ता
है। तुम बेठो, में अभी जादमी सेमती हूँ।
यह कहकर उदढ़िया ने एक झीरत्त को घखुलछाकर कहा--छोटे मिरज्ञा के
पास जाओ ओर कही कि श्रापक्ो छुलाती हैं । या तो हमको, घुलाइए
या खुद जाहए। कं
इस करत का नाम मुबारक कदम था। उसने जाकर मिर्जा आजाद
को बुढ़िया का पैगाम सुनाया । हुज्ूर, चद् खबर सुना कि आप भी
फसहक जाये । सगर इनाम देने का वादा कीजिए । * |
श्राजादु--आजाद नहीं, क्रगर मालासारून कर दें । ।
मुबारक--उछल पड़िएगा।
श्राज़ाद-+क्या कोई रक़म मिलनेवाली है ?,
मुपारक--अजी, वह रफम मिले कि मवबाब हो जाओो। एक वेगम-
साहब ने पैगाम भेजा है । बस, आप मेरी छुढिया के मकान तक चले
चलिए । गा ना
ह श्राज़ाइ--उनको यहीं न बुला लाझो। न
मुवारकर-सें वेडी हूँ, भाप चुलवा लीजिए 7. , -
थोड़ी देर में बुढ़िया एक डोली पर सवार शञ्रा पहुँची ग्रीर घोली--
है
* क्या इरादे हैं ? कब घलिएगा ?/ का
दधाएगार-ह दा ध्स्ट्द
]
शाज़ाइन-पटले बाप बाप को दशारी । इसीत गिर |,
मुदिया-हती, जुस्त तो छह हैं दि हद भी साय ही जाके, हर
हीझत का सो कोरी दिशातगा हहीं थो कप पते का इरादा | ?
धापादलआइले सूद परकानयों:र चरुतणे, शो हुसि रे कदों । दावा
में हो दि यहाँ छोटशर मेखना पं ।
* ओआततठती प्रिषछ
हमारे थिमाँ दाद ही ए्पचप्रत द शिया में माग में पिता चोर
फोई बात गहीं हि एसी गो) इक जिफमे ही हिजे/, इग्रामदार, शएये
आदगी थे इतने ही यह फरेगी, जाखिए सीर परुशीएव परे १ माल्य शाह
हार हा थे नहीं, मगर खा सी शपदे पक्षी से छे मिलें थे । डवेणा हम,
में की्श आअजी गे मे पिघ्लेंडार, परफे फिरे के गज्माश, चोरों थी फीग, इणा
च्क्पं
गाशों के सगोडदिएवार, टाइओं के शोप्त, गिरूदज के छाधी । फियी की
णाम छेगा इसके आए हाथ देठ काय था ) रिप्सोते दोडी की, शमी को
गरदन छाटी । धरमीर से मिलनुरकर रहना और मारी घुएफीनकड्फी
सहना। इनएा खास प्रैजशञा था । छैफिद घ्िसके यहाँ दसफ पाया, इपकी
या तो ऊँगोदी परैधदा शी या छठ छिलके लगा हुंम | शार के गष्टायम
कौर साह फार इनसे धरथर काविपे पते । घिस महाजन से झो माँसा,
इसने हाशिर किया झीर जो हलबार किया सो हुसरें रोज छोटो ही गई ।
इनके मिनाय की क्मव क्रेकियत थी । पच्चे से बच्चे, सड़ीं में गटे,
जवानें। में जधान । फ्ोई यात ऐसी नहीं जिमका इन्हें तंगर्या न हों। एक
साल सके छोड में भी नौकरी की धी। पहाँ थापने एफ दिन सद दिएलगी
की कि रिसाछे के बीस धोड़ों की अग्राद़ी-विछादी खोछ डाली । धीएँ हिन-
हिलाकर छड़ने छगें। सब छोग पढ़ें सो रहे श। धोडे जो खुले, तो सय-फ्े-
०६४ चझाज़ाद-कथधा
सब चौक पढे । एक योला--लेना-लेना ! चोर-चोर [पकड़ लेना ! ज्ञामे न
पाण। बड़ी मुशकिल से चन्द घोड़े पकड़े गये । कुछ जखमी हुए, कुछ
भाग गये । अब चदकीकात शुरू हुईं। आजाद मिरजा सी सबके साथ
हमदर्दी करते थे कोर उस बदमाश पर बिगड़ रहे थे जिसने घोड़े छोड़े

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