क्रीमपाइ

भहरी -धक्छाह जानता है, में उप्तक्ी आँखों से ताइ गई थी कि घदा
॥।
सटखट हैं ।
खरहूबान -हुज्वर, यह ऋषटना तो भूल ही गया था हि कैद से ,भागः
कर घानेदार के मकान पर गया और बसे भी कन्छ का दिया।
आज़ाद-कथा ६१५
बेगम -सब आदमियों में से निकल भागा ?
महरी-भादमी है कि जिन्‍नात ?
भव्यासी-हुजू!, हमें आज दर साछूम होता है । ऐपा न हो, हमारे
हाँ भी चोरी करे ।
चण्ड्बाज रुखसत होकर गए तो सुरैयावेगम सो गईं। महरियाँ नी
रैटीं, मगर श्रव्वासी की शआँखों में नींद न थी। सारे खौंफ के इतनी
हिम्मत भी न बाकी रही कि उठकर पानी तो पीती । प्याप्त से तादू से
काटे पड़े थे । सगर दवकी पड़ी थी। उसी चक्ते हवा के भेफों से एक
कागज़ उड़कर उसके चारपाई के क़रीय खडखड़ाया तो दम निकल गया !
सिपाही ने आवाज दी-'सोनेवाले जागते रहो।” और यह काँप उढी।
ढर था, कोई चिमट न जांबे । छाशें झ्रखिं-तले फिरती थीं । इतने में
बारह का गजर ठनाठत बज्ना । तब अबव्बासी से अपने दिल में कहा, अरे
अभी बारह ही बजे। हस समझे थे, सवेरा हो गया। एकाएक कोई विह्यग
के धुन में गाने छगा --
सिपहिया जागत रहियो,
इस नगरी के दस दरवाजे निकस गया कोई और ।
सिपहिया जागत रदियो ।
भव्बासी सुनते-खुनते घो गई।, मगर थोड़ी ही देर में ठनाके की आ्रावाज़
थाई तो जाय उठी । श्रादमी की आइट साछूम हुईं। ए्वाथ-पाँच कॉपने
ऊगे। इतने मे वेगमसाहब ने पुछारा-अद्वाली पावी पिछा।
भव्वासी ने पावी पिछाया और बोछी-हुजूर, अब कभी लाशें-बाशों का
जिक्र न कीजिएुया । मेरा तो शमव हाल था। सारी रात आँखें में ही
कद गई ।
बेगम--ऐसा भी डर फिस कास का, द्व को ओर रात को भेड़ ।
5 8 जवजादुब्फकथा
बेगमसाहब सोने को ही थीं कि एक आदम ने फिर गाना शुरु किया।
बेगम--भच्छी आवाज़ हे !
अ्व्यासी--पहले भी या रहा था ।
महरी -ए, यह वकील हैं।
कुछ देर तक तीनों बातें करते-करते सो गईं । सवेरे मर ह-अँधेरे महरी
उठी तो देखा कि बड़े कमरे का ताला हटा पढ़ा है । दो सन्द्ृक ह॒टेफूरे
एक तरफ रकक्‍्खे हुए हैं. झोर भ्रतवाव सब तितर-वित्तर । गुर मचाका
कहा- अरे ! छुट गईं, हाय लोगो लुट गई ! घर में कुदराम मच गया ।
दारोगासाहव दोड पड़े । भरे यह क्या ग़ज़ब हो गया। बेगम की भी
नींद खुलो । यह हालत देखी तो हाथ मलरूर कट्टा-लुट गईं! यह
शोर-गुल सुबकर पडोतिनें गुरु मचातो हुईं कोठे पर आईं घोर योलीं**
बहन, यह वमचख कैसी है ! क्‍या हुआ ? खैरियत तो हैं !
बेगम-बहन, में तो सर सिटी ।
पडोसिन--क्या चोरी हो गई / दो बजे तक तो में आप छोगों की
बातें खुनवी रही । यद्द चोरी फिय वक्त हुई ?
अव्याधप्ती--बहन, क्‍या कहूँ द्वाय !
पदोध्षिन--देखिए तो अच्छी तरद | क्या-क्या छे गया, बयाययां
छोड गया ?
बेगप्र--महन, किप्तके होश ठिकाने हैं ।
अव्यासी--सुझ जकूम-जली को पहले ही ख़दका हुआ था। कात
खड़े दो गए, मगर फिर कुछ सुनाई न दिया। मैंने कुछ गया ने किया।
दारोग़ा--हुज्नर, यह किसी शैतान का काम है। पा तो पा ही ढाईूँ।
महरी--मिस हाथ से सन्दृक तोड़े, वह कदकर गिर पड़ें। मिस पाँव
से धाया उसमें कौड़े पढ़े । सरेंसा बिछय विकूफकर ।
शआज़ाद-कथा ६१७
अ्रब्वासी-- अल्लाह करे, भववारे ही में खटिया सचमचाती निकले ।
महरो--मगर अव्यासी, तुम भी एक ही कऊशिभी हो | वही हुभा |
सुरेयावेगम ने असवाव की जाँच की तो आझ्ञाथे से ज्यादा गायब
पाया । रोकर गोली--लोयो, में कहीं की न रही । हाय मेरे अब्बा, दोड़ो।
तुम्हारी लाड़िली बेटी आज छुट गईं ! हाय मेरी श्रस्माजान | सुरेयावेगस
अब फ़क्ीरिन दो गई ।
पड़ोसिन--बहन, ज़रा दिल को ढारस दो। रोने से भौर हलकान
होगी ।
' बेगम--किमसत ही पछट गई । द्वाय !
पड़ोसिन--ऐ ! कोई हाथ पकड़ छो । सिर फोड़े डालती हैं । बह्चन,
बहन ! खुदा के वास्‍्ते सुनो तो ! देखो, सघ माऊ मिला जाता है । घन-
राध्ो नहीं ।
इतने में एक महरी ने गुछ मचाकर कहा - हुजू्‌र, थह जोड़ी कड़े की
पी है !
अब्यवाती--भागते भूत की रूयोटी ही सही |
लोगों ने सलाह दी कि थानेदार को बुछाया जोय, मगर सुरैयावेगम
तो थानेदार से डरी हुईं थीं, बाम सुनते ही काँप उठी भौर बोलीं--बहन,
माल चाहे यह भी जाता रहे 'सगर थानेचालों को मैं झपवी ड्योढ़ी न
नाँधने दगी। दारोग़ाजी ने आँख ऊपर उठाई तो 'देखा, छत कटी हुई है ।
समभक गए कि चोर छत काटकर, झ्राया था। एकाएक कई कांस्टेबिल
बाहर आञा पहुँचे। कब वारदात हुईं ? नव दफे तो हस पुकार गए।
भीतर-प्राहर से तो बराबर आवाज शआलाई। फिर यह चोरी कब हुई ?
दारोगाजी ने कहा--हमको हस़ टाँय ढाँय से कुछ चास्ता नहीं है जी ?
आए वहाँ से रोड जमाने ! ढके का, आदमी भोर हससे ज़वान मिलाता
६१८ आज़ाद-कथा
है। पड़े-पड़े स्लोते रहे और इस वक्त तहफीकात करने चले हैं ३ पता
हजार का माल गया: है । कुछ ख़बर सी है !
कांस्टेबिलों ने जब सुना कि साठ इज़ार की चोरी हुईं ठो द्ोश उः
गए। झापस में यों बातें करने ऊूगे--
१--साठ हजार ! पचास और दुइ साठ ? काहे !
२--पचास दुु्ट साठ नहीं, पचास और दस साठ !
३--भजी खुदा खुदा करो । साठ हजार। क्या निरे जवाहिरात ही
थे ? ऐसे कहाँ के सेठ है।
दारोगा--सममका जायया, देखो तो सह्दी ! तुम सत्रक्री साजिश है।
५--दारोगा ठरकीय तो अच्छी की । शायाश !
३- बेगम साहब्र के यद्याँ चोरी हुई तो बछा से। तुम्हारी वो
होडियाँ चढ़ गई । कुछ हमारा भी हस्स्ा है
इतने में थानेदारसाहव भा पहुँचे भर कहा, हम मोक़ा देखेंगे।
परदा कराया गया । थानेदारसाहब झन्दर गए तो बोले--भ्रए्पाह,
इतना बढ़ा सकान है ! तो क्‍यों न चोरी हो ?
दारोग़ालक्या ? मकान इतना बड़ा देखा भौर आदमी रहते नहीं
देखते !
थानेदार--रात को यहाँ कौन-झोन सोया था १ “
दारोग़ा-अब्बासी, सबके नाम लिखवा दो ।

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