वायलेट स्टार नग्न

गोली पाकर गिर पढ़ा | चुक तो हारकर भाग विक्ले। रूततियों की
पक पलटन ने इस मैदान में पड़ाव डाला | खोजी पीनक से चोककर यह
उम्ताशा देख रदे थे कि एक रूसी जवान की नजर उन पर पड़ी | बोला--
कौन $ तुम कोन हो ? असी उतर आओ |
'आ्राज़ाद-कथधा ६०७
खोजी ने सोचा, ऐसा न हो कि फिर छेले पढ़ने छूगे नीचे उत्तर आए ।
प्रभी जमीन पर पाँव भी न रफ्खा था, कि एक रुसी ने इनको गोद में
उठाकर फेंका तो घम से ज़मोन पर गिर गए ।
' खोनी--भो गीदी, खुदा तुमसे ओर तुम्हारे बाप से समझे !
एक रूपी--भई, यह पागल है कोई ।
इधरा -हसको फोज के साथ रक्खो । स्व द्ल्‍लगी रहेगी ।
रूसियों ने कई तुफ सिपाहियों को केदु कर लिया था | खौजी भी उन्हों
के साथ रख दिए गए । तु को देखऊर उन्हें जरा तसकीन हुईं। एक
वर्क वोछा-तुम तो आज़ाद के साथ आए थे न ? तुम उनके नौफर हो ?
खोनीनपेरा छड़का है जी, सुम नौकर बनाते हो ।
तुक--एं, आप आजाद पाश। के बाप हैं !
खोजी--हाँ-हां, तो इसमे ताञ्जुब की कौन बात है। मैने ही तो
श्राज़ाद को भार-मारकर लड़ना सिखाया ।
तु ने सोनी को आज़ाद का बाप समझकर फोजी कायदे से सलाम
किया । तब खोजी रोने छंग्रे-अरे यारो, कहीं से तो हमें लड़के की
मृरत दिखा दो । क्या तुमको इसी दिन के लिए पाल-पोलकर इतना बड़ा
किया था १ अब तुम्हारी माँ को क्या सूरत दिखाऊँगा ।
तुक-आप ज्यादा वेचेन न हों । आज़ाद मेरूर छठेंगे ।. ' .'
' खोजी-भई, मुझे तो बुढ़ापे में दाग दे गये ।
तुर्क -हुजूर, अब दिल को सेभाले। !
खोजी--भई, मेरी इतनी इज्जत न करो नहीं तो रूप्तियोँ को शक
हो जायगा कि यह भाज़ाद पाशा के बाप है । तब बहुत तंग करेंगे ।
तुकं-खुदा ने चाद्या तो अफसर छोग आप को जरूर छोड़ देंगे ।'
खोनी--जैसी मोला की मरज़ी |
६०८ आज़ाद-कथा
:. ' इकहत्तरवों परिच्छेद.'
बढ
बडी वेगस का सकान परीखाना बना हुआ है। चारों बहनें रविशों
में अठखेलियाँ करती है । नाजोश्रदा से, तौल-तोलकर कदम धर्रत
है। श्रब्याती फ़ूछ तोड-पोड़कर फोलियाँ भर रही है । इतने में सिपह
आरा ने शोखी के साथ गरुछाश का फ़ूछ तोड़कर गेतीआरा की तार
फेंका । गेतीआरा ने डछाहा तो सिपहआरा की झुढ्फ को छूुता हुश्न
नीचे गिरा । हुस्तआरा ने कई पूछ तोड़े ओर जहानाराब्रेग से में!
खेलने ऊलगीं। जिस चक्त गेंद फेंकने के लिये हाथ घ्ञात्ती थीं सिता
ढाती थीं ! चह कमर का छूचकना भौर गेम्त का विखरना, प्यारे-प्या'
हाथों की छोच और मुसकिरा-सुसकिताकर निशानेबाज़ी- करता भ्रज)
छुत्फ़ दिखाता था । '
भब्बाधी--प्राशा-धल्लाह, हुजूर किध सफाई के साथ फेंकी हें !
* प्िपद्श्नारा- बस अब्यासी, श्रत् बहुत सुशामंद की न छो। या
जहानारा बहन सफ़ाई से चढ्टीं फेकर्ती ? बाजी जरी मापदती ज्यादा
हैं। मगर _मसे न ज्वीत पाएँगी। देख लेना ।
भ्रव्वावी-- मिल सफाई से हुस्तथारायेगम सेंद्र खेझसी हैं, गए
सफाई से जहानाराबेगम का हाथ नहीं जाता ।
सिपह शारा--मेरे हाथ से भरा फूछ गिर सकता है ! क्‍या मजाल।! *
इतने में जदानाराबेगम ने फूछ को नोंच डाह्ा और डफ़ कहकर
बोली--अल्छाह जानता है, इम तो थक्ल गए ।
पिपहआरा-- ऐ वाह, वध्त इतने में ही थक गई 7 हमसे ऋष्टिप,
शाम तक खेला करें ।
स्रय सनिए, कि एक दोस्त ने मिरजा हुमाय्ँ फर को जाकर: दृत्तिता
आजाद-कथा ६०९
दी कि इस वक्त बाय में परिर्या धर से उधर दौड़ रही हैं। इस वक्त
की कैफियत देखने क्ाशिल है। शहज़ारे ने यह खबर सुनी तो बोके--
भर, खुशखबरी तो सुनाई सगर कोई तदबीर तो बताषो। ज़रा शाँखे
ही सेंक ले। हाँ, हीरा साली को बुहाभो । जरा देखे । ३
हीरा ने झाकर सल्वास किया | * *
शइजादा--भई, इस चक्त हुप्री हिकमत से अपने बाग की
सैर कराश्रो ।
हीरा-खुदावन्द, हृव वक्त तो साफ़ करें, सब वहीं हैं ।
शहज़ांदा-उढ्ठ़ ही रहे, भरे मियां, वहाँ सन्‍नारा होता तो जाऋर
क्या करते ! सुना है, चारों परियाँ बढ़ीं हैं ! बाग परिस्ताम हो गया छोोगा !
हीरा छे चल, ठुके श्राने नारायन की कल्षम ! ज्ञो माँगे फौरन दूँ ।
द्वीग--हुजूर ही का तो नप्तर खाता हूँ, या किसी और का !
मगर इस बक्त मौका नहीं है । “
शहजादा -अच्छा, एक शेर लिख दूँ वर्दां पहुँचा दो.।'
यह कहकर शझजादा ने यह शे” छिखा-- “'
छुकाया तूने एक आलम को साक्ी जामे-गुलगूँ से,
हमें भी कोई सागर, हम भी है उम्मेदवारो में ।
हीरा यद्द रुक्‍्का लेकर चहा। शहज़ादे ने समझा दिया कि सिपह-
, भारा छो चुपके से दे ठेना । हीरा यया तो देखा कि श्रव्म्ास्ी ओर बूढ़ी
सहरी में त्करार हो रही है । सुबद के वक्त 5व्यासी हुस्नशारा के लिये
कुम्हारिन के यहाँ से दो मम्ररियोँ छाई थी । दम एक शाना बतलाया।
बड़ी बेगम ने जो यह भोमरियाँ ठेखीं तो सहरी को ' हुक्म दिया क्रि
हमारे वारते भी ऊाझो। महरी वैसी ही मैकरियाँ दो आने को छाई।
इस वक्त भज्बाखी डींग मारने छगी कि में जितनी सस्ती चीज़ छाती
६१३० आज़ाद-कथा
हूँ, कोई दुवरा भरा ला तो दे ! महरी शोर श्रव्यासी मे पुरानी चश्म
थी। चोली--हाँ भई, तुम क्‍यों न सस्‍वी चीज़ छाम्रो ! भर
कमप्िन हो न ?
श्रद्याधी-तुम भी तो किपी ज़माने में जवान थीं। बाज़ार-भर व
छूर लाई होगी । मेरे मुँह न लूगना ।
महरी--होश की दवा कर छोकरी ! बहुत्त बढ़-बड़कर बातें तबन
मुद्दे ! शप्ताने-मर की आवारा ! और सुनो !
अब्यासी--देखिए हुज्ूर, यह राम-काफ़ जवान से निकालती हैं
और में हुज्लर का लिहाज़ करती हूँ। जब देखो, तामे के सिवा बांत ६
नहीं करती ।
मदरी--प्र 6 पकड़कर कुछ देती झुरदार का!
भ्रश्यापी--मुं ६ फुलस आने होते-सोतों का ।
महरी--हुज़र, श्रव हम नोकरी छोड़ देंगे । हमसे थे बातें न
सुनी जायंगी
” अ्षब्यात्ती-ऐं, छुम तो थेचारी नअनन्‍्हीं हो। हमीं गरदन मारते के
काबिल हैं । सच है और क्या !
घिपहआरा-सारा कुप्तर मदरी का है। यहीं रोज़ लड़ा करती है
अब्बासी से ।
महरी -ऐ हुजर, पीच पी हज़ार नेसत पाई । जो मैं ही कंगाल हँ,
तो विस्मिब्लाए, हुज॒र छोडी को आजाद कर दें। कोई बात न चीन,

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