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आप ही गाली-गुफ्ते पर आमादा हो गई ।
जद्दानारा--लड़ेगे जोगी-जोगी भीर जायगी खप्पड़ों के माधे।' अस्मा
जान सुन लेगी तो हम सबकी रबर लेंगी ।
भदबापती--हजूर ही इंसाफ से कहें । पहल क्रियकी तरफ से ह४ * ।
बाज़ाद-कथा ६११
जहानारा--पहलू तो महरी ने को । इसके क्या मानी कि तुम जवान
हो, इस्ततते सस्ती चीज़ मिल जाती।हे "..जिधको गाली देगी, वह
चुरा मानेगी ही । न्‍
हुस्तआरा-महरी, ठुम्हें यह सूझी कया। जवानी का कया जिक्र
था भरता ! 22732 #
णब्यासी--हुजू !, मेरा कमर हो तो जो चोर की सज़ा वह मेरी सजा ।
महरी -मेरे भल्छाद, भौरत क्या, विप की गाँठ है ।
श्रव्यासी --नो दाही सो कह छो, में एक बात का भी जबाब न हूँ गी।
महरी--दघर की उधर और उधर की इधर लगाया करती है। में
तो इक्षकी नस-नस से वाकिफ हूँ ।
अव्यासो--औ्ौर में तो तेरी:कब्न तक-से वाकिफ हैँ !
मदरी-रुक को छोड़ा दृपरे के घर बैठी, उसको खाया श्रब किप्ली
ओर को चट करेगी । शोर बातें करती है !
सत्तर,,,... ..के वाद कुछ कहने ही को थी कि अझब्बासो ने सैकड़ों
गालियाँ सुनाईं जोर ऐसी जामे से बाहर हुईं कि. हुपद्धा एक तरफ़ और
खुद दूसरी त्रफ। हीरा साली ने बढ़कर दुपद्धा दिया । तो कहा->चर
5, भर सुनो ! इस सुए बूढ़े की बाते ! इस पर कुद्ूकहा पड़ा। शोर
सुनते ही बड़ी वेशमलाहब, लाठी टेकती हुई भ्रा पहुँची, सगर॒यह सब
चुदल में मस्त थीं। किपघ्ती को खबर भी न हुईं ।
चडी बेगम -यह क्या शोहदापन मचा था ? बड़े शर्म की वात है!
भाज़िर कुछ कहो तो ? यद्द क्या धम्ताचौकड़ी मची थी ? क्‍यों महरी,
यह क्‍या शोर मचा था ?
सदरी -ऐ हुजूर, बात मुंह से निकली झौर अब्बासी ने देडुआझा
लिया । और क्या बताऊँ !
६१२ श्राजाद-कथा
बडी बेगव--क्यों अव्वासी, सच-सच बताश्रो ! खबरदार !
अड्बासी -( रोकर ) हुजूर ! ' ॥
बड़ी बेगस--अब टेसुए पीछे बहाना, पहले हमारी बात का जराबदडो।
अ्रव्परासी --हुज्र, जदानाराबेवम से पृ ले, हमें घ्रावारा कदा, बेसन
कहा, कोसा, गालियाँ दीं, जो ज़प्रान पर आया कए डाछा। शोर हुज्ञा
इन आंखों की ही क़पम खानी हैँ, जो मैंने एक घात फा भी जवाः
दिया हो । घुप सुना की ।
बड़ी वेगम -जद्वानारा, क्या बात हुई थी १ वताशो साक-साफ।
जहानारा -अ्रम्माहान, अव्यासी ने कहा कि हम दो ऑकरियाँ एक
आने को छाए और महरी ने दो आने दिए इसी बात पर तकरार हो गई।
बड़ी बेगम-क्यों मदरी, 8णके क्या साभी २ क्‍या जवानों को बाजार
बाले मुफ्य उठा देते हैं। बाल सफेद हो गए मगर अभी सक आवारापन
को यू नहीं गदे। हमने तुमको मोकूफ किपा सहरी। बाज हो निकछ जाओे।
इतने में मौका पाकर होरा ने सिप्आरा को शहज़ादे का सर
दिया । सिउजारा ने पठकर यद जवाब लिया-भई, तुम तो ग़याओे ,
जर्दबाज हो। शांदी-व्पाह भी निगोड़ा सुँह का नेवाका है! मुस्री |
तरफ से पैगाम तो थाता ही नहीं । हि
हीरा सत लेकर चड़ दिया ।
हचर न परिच्छेद
ऋहचतरतआा पारच्छुद
कोंडे पर चौका ब्रिछा है भौर एड नाजुक पलंग पर सुरैयाग्ेगत
खादी कोर हठकी पोभा ५ पदने आाराम से छेदी है। आप्री हस्ताम से
आई है। फपड़े इत्र में बपे हुए है। इधरलघर फृर्तों के द्वार भोर यही
झाज़ाद कथा ६१३
रक्से है, उडी-ठडी हवा चल रही दे। मगर तब भी महरी पंख्ा लिए
खड़ी है। इतने में एक महरी ने झाकर कद्दा-दारोग्राजी हुजूर ले कुछ
अज्ज करना चाहते हैं । बेगमसाहव ने कह्टा--श्रव इस वक्त कोन उठे ।
कहो, सुब्रह को झापें। मदरी बोली -हुज्लूर, कइते हैं. बडा ज़रूरी काम
हैं। हुक्‍म हुआ कि दो धोरतें चादर ताने रहें भोर दारोशासाइब चादर
के उस पार बैठे । दारोग़ासाइव ने श्राऋर कद्गो-हुज्ञर, भब्छाह ने बदी
खैर की । छुद। को कुछ श्रच्छा ही काता मजूर था । ऐसे बुरे फँसे थे क्रि
क्या कहे !
बेगम-एं, तो कुछ कषहोगे भी ?
दारोगा--हुजूर, बदन के रोएँ खडे होते हैं ।
इस पर झब्वाती ने कहा--दारोगानी, घास तो नहीं ला गए हो !
दूसरी महरी बोली -हुज्नूर, सठिया गये हैं । तीपरी ने कहा--बीसलाए हुए
आए है । दारोगासाहब बहुत ऋरठछाए | बोले -क्या कृद्र होती है वाह !
हमारी सरकार तो कुछ बोलती है नहीं प्रौर महरियाँ सिर चढ़ी जाती
हैं। हुज्जर इतना भी नहीं कहतों कि बूढ़ा श्रादुों है । उसदे न बोलो ।
बेवभ-तुम तो सचमुच दीवाने हो गए हो | जो कहना है, चह कहते
क्यों चहीं ६
दारोगा-हुजूर, दीवाना समर्के या गधा बनाएँ, गुलाम आज काँप
रहा है | वह जो आज़ाद हैं, जो यहाँ कई बार जाए भी थे, चह्द बड़े
सक्कार, शाही चोर, नामी डकेत, परले सिरे के बगड़ेबाज, काल-जुल्मारी,
भावत शराबी जम्ताने-भर के बदमाश, छठे हुए गुगे, एक ही शरीर और
बदजात आदी हैं| तृवी का पिंजड़ा लेकर वही पश्ोरत के भेत में झाया
था। आाज,सुता किप्ती नवाब के यहाँ भी गए थे । चंद आजादु, जिनके
: धोखे में आप हैं, वह तो रूम गए हैं। इनका-उनका झुकाब्रिका कया!
छ्‌
६१४ आजाद-कथा
वह आालिम-फाजिल, यह वेईमान-बदुमाश । यह भी उससे गलत कहा वि
हुस्नआरा बेगम का ब्याह हो गया । ६ *
- बेगम दारोगा, बात तो तुम पते की कहते हो सगर ये बाते
तुमसे बताई किसने ? - , ८
दारोगा -हुजूर, चह चण्ड्बाज जो आजाद मिरजा के सावथ्ाया था।
उच्ची ने मुझते बयान कियाँ। नल 22 «2
बैगम-ऐ है, अल्छाढ़ ने बहुत बचाया ।
मदरी -थौर बातें केसी चिक्रनी-छुयड़ी करता था !
दारोग़ामाहब चले गए तो बेगम ने घण्डूबाज को घुलाया | सहरियों न
परदा करना घाहा तो बेगम ने कहा --जाने भी दो । घूढ़े ख़ुसद से ररदा क्या ।
चण्दूवाज--हुजूर, कुछ ऊपर सी बरस का सिन है।...“-
बेगप्-हाँ, आज़ाद मिरज्ा का तो हाल कहो ।
पण्दूबाल -उपके काटे का मंत्र ही नहीं ।
बेगम--तुमने कहाँ झुराकात हुईं !
घण्दूबाज--एक् दिन रास्ते में मिल गए ।
बेगम -वह तो केद न थे ! भागे क्‍्यें हर ?
पण्ड्वान--हुजू र, यह न पृछिए, तीन-त्तीव पहरे घे। मगर पुदा
ज्ञाने किस ज्ञाह-मत्र से तीनों को ढेर कर दिया घोर भाग जिकले ।
बैसम--अल्ऊाह बचाए ऐसे मनी से ।
चण्ड्याज-हुज़ूर झुके भी जब सब्ज बाग दिखाया ।

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